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Showing posts from August, 2022

जोसेफ ब्रोड्स्की

     कवि जोसेफ ब्रोड्स्की  1953 मा स्टेलिनको मृत्यु पछि सोभियत रसियाको सत्ताको बागडोर ख्रुश्चेभले सम्हाले। देश केही खुकुलो भएको जनताले महसुस गर्न थालेको थियो। यद्यपि वाक स्वतन्त्रता, लेखनमा छुट र सत्ताको नीतिमाथि कुनै प्रकारको आलोचना गर्न बन्देज भने कायमै थियो। त्यो समय त्यहाँका सचेत बुद्धिजीवी र युवा समूहले सत्ता विरोधी अभियान आरम्भ गरेका थिए। यही सोभियत सत्ताप्रति असन्तुष्टि जनाउने समूहमा युवा कवि जोसेफ ब्रड्स्कीको नाम विशेष उल्लेख्य छ। त्यसकालमा सत्ताले कुनै विरोधको स्वर सहन गर्दैन थियो। यही कारण ब्रोड्स्कीलाई हिरासतमा लिइयो। उनलाई आरोप लगाइएको थियो उनी एक नैतिक पतन भएको, कुनै काम गर्न नमान्ने, सोभियत सत्ता विरोधी कविता लेख्ने, समाजको निम्ति घातक र प्रतिक्रियावादी छन भनेर। यो घटना 1964 मा  भएको थियो। उनले आफ्नो औपचारिक पढाइ पनि बिचमै छोडेका थिए। सानातिना अस्थायी रोजगार र सत्ता विरोधी कविता लेख्नमा नै उनले आफूलाई समर्पित गरेका थिए। त्यतिबेला ब्रोड्स्की 24 वर्षको मात्र  थियो। उनले आफ्नो अपराध स्वीकार गर्नु मानेन यसैले न्यायाधीश अघि उभ्याइयो। उनले न्यायाधीश...

एक पाठक की तलाश

एक पाठक की तलाश पेम्पा तामाङ उसे साहित्य हर पल उलझाए रखता था। उसकी पढ़ने की आदत कहानी से निर्मित हुई थी। छोटी उम्र में हातिमताई ,  वीरसिक्का ,  एकदेव ढकाल विरचित आतंक ,  राक्षस राज ,  सिंदबाद की कहानियाँ खूब रस लेकर पढ़ता था। कुछ बाद में संभवतः सातवीं कक्षा में होगा तो प्रकाश कोविद ,  सुरेश राई की     कहानियाँ पढ़ने लगा था। उस दौरान वह शिवकुमार राई की कहानियाँ भी पढ़ने लगा था। वह सोचने लगा था कि क्या उसकी पढ़ी कहानियाँ साहित्य हैं ?  कौन साहित्य है और कौन साहित्य नहीं है ? कहानियाँ क्या शिक्षा और ज्ञान के लिए लिखी जाती हैं ?  लेकिन क्यों कहानियाँ पढ़ते समय आनंद आता है ?  एक कहानी पढ़ने के बाद दूसरी पढ़ने की इच्छा जगना। उसके मन में ऐसे ही सवाल कुलबुलाते रहते थे। बाद में स्नातक स्तर में उसने अपना प्रमुख विषय नेपाली साहित्य चुना- स्नातक सम्मान लेकर उत्तीर्ण हुआ। उसी दौरान उसने कहानी लिखने का प्रयास किया। कुछ कहानियाँ लिखी भी लेकिन संतुष्टि नहीं हुई। उपन्यास भी लिखा लेकि न छपाने की हिम्मत नहीं हुई। विश्वविद्यालय में अध्ययनरत उसने एक-दो ...

कालोभारी

कालो भारी पेम्पा तामाङ भारत-तिब्बत सीमा व्यापार कालिम्पोङ-रंगेली-जलेप-ला दर्रे से होकर बहुत पहले से चलता आ रहा था। चीन में माओ-त्से-तुङ के अधीन शासन आने के बाद तिब्बती प्रशासन में हस्तक्षेप शुरू हुआ। 1959 में दलाई लामा का भारत निर्वासन होने के बाद तिब्बत पूरी तरह चीन के अधीन न हो गया। संभवतः तिब्बत अधिक्रमण काल में असंख्य चीनी जनसमूह तिब्बत से विस्थापित हुए। इससे वहाँ खाद्य आपूर्ति की समस्या खड़ी हो गई। उसी समय यही कालिम्पोङ-रंगेली-जेलेप-ला के रास्ते से होकर खाद्य सामग्री की तस्करी होती थी। इसमें अनेक चतुर व्यापारियों ने रातों-रात पैसे कमाए। यह तस्करी 1962 को भारत-चीन युद्ध के बाद बंद हो गई। इसी काल की एक झलक इस कहानी में मिलती है।   निमा दोर्जे बहुत उदास था। घर में आकर अम्मा ने, दो-चार कमा कर मेहमानों की गर्ज टालने में मदद के लिए बनाए चावल के जाँड़ का बर्तन उठाया और हलुंगे के एक मग में भर कर निंगार निकाला। एक ही घूँट में गटक कर सीधा बिस्तर पर लंबी तान कर सो गया। घास काटकर आने से बाद एक कौर भी मुँह में नहीं डाला था। उसे घास काटने जाते हुए मसिनी के साथ हुए प्रसंग की याद आ जाती है। म...