कालो भारी
पेम्पा तामाङ
भारत-तिब्बत सीमा व्यापार कालिम्पोङ-रंगेली-जलेप-ला दर्रे से होकर बहुत पहले से चलता आ रहा था। चीन में माओ-त्से-तुङ के अधीन शासन आने के बाद तिब्बती प्रशासन में हस्तक्षेप शुरू हुआ। 1959 में दलाई लामा का भारत निर्वासन होने के बाद तिब्बत पूरी तरह चीन के अधीन न हो गया।
संभवतः तिब्बत अधिक्रमण काल में असंख्य चीनी जनसमूह तिब्बत से विस्थापित हुए। इससे वहाँ खाद्य आपूर्ति की समस्या खड़ी हो गई। उसी समय यही कालिम्पोङ-रंगेली-जेलेप-ला के रास्ते से होकर खाद्य सामग्री की तस्करी होती थी। इसमें अनेक चतुर व्यापारियों ने रातों-रात पैसे कमाए। यह तस्करी 1962 को भारत-चीन युद्ध के बाद बंद हो गई। इसी काल की एक झलक इस कहानी में मिलती है।
निमा दोर्जे बहुत उदास था। घर में आकर अम्मा ने, दो-चार कमा कर मेहमानों की गर्ज टालने में मदद के लिए बनाए चावल के जाँड़ का बर्तन उठाया और हलुंगे के एक मग में भर कर निंगार निकाला। एक ही घूँट में गटक कर सीधा बिस्तर पर लंबी तान कर सो गया। घास काटकर आने से बाद एक कौर भी मुँह में नहीं डाला था।
उसे घास काटने जाते हुए मसिनी के साथ हुए प्रसंग की याद आ जाती है। मसिनी... आज भी मुलाकात हुई थी उससे, रोजाना की तरह। उसने मसिनी की भी लकड़ियाँ काटकर डोको में तरतीब से मिलाकर रख दी थीं। बात ही बात में विवाह की बात उठी। अनायास ही उसने मसिनी से कहा, “मैं तुझे भगाकर ले जाऊँगा।”
एक पल के लिए मसिनी हक्की-बक्की रह गई। वह जवाब भी नहीं दे पाई। लेकिन फिर जैसे गुस्से में तिरछी नजरों से देखते कहती है- “तेरे इतने कहने भर से कुछ होता है? पहले कुछ पैसे कमा, अपना घर बना और फिर भगाने की बात कर...पक्की छत वाले घर की बेटी को ऐसे ही फोकट में ताकने से कुछ नहीं होगा!”
मसिनी की प्रतिक्रिया सुनकर निमा दोर्जे को गुस्सा तो आया लेकिन लगा मसिनी दिल्लगी कर रही है, इसीलिए जवाब में कहा, “पैसे तो कमाऊँगा ही।”
“मुझ पर क्यों डोरे डालता है? तेरी फूंग्ली है तो... अम्बा टीले वाली! तुझ पर तो मर मिटती है!”
फूंग्ली का जिक्र सुनते ही उसे गुस्सा आने लगा- गहरी चोट भी लगी। मसिनी की बात सुनकर बाकी सभी हँस पड़े थे। निमा ने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया। कुछ भी कह नहीं पाया और अपने हाल की बीस साल की उम्र की जिंदगी में पहली बार अपनी गरीबी का अहसास हुआ। मन खट्टा हो गया।
उसी शाम ऊपर पास्तिङ में एक घर में सत्यनारायण की पूजा हो रही थी। वह न जाए ऐसा हो ही नहीं सकता। उसका हितैषी मित्र मिठे गुरुङ भी वहीं रहता है।
दोनों की मुलाकात होते ही बातें खुलती हैं। निमा दोर्जे ने दिनभर की बातें उसे सुना दीं। मसिनी की बातों से लगे आघात, गरीबी की असलीयत से रू-ब-रू होने और कैसे जल्दी से जल्दी पैसे कमाने की जुगत के बारे में मिठे गुरुङ ने कहा, “एकदम झटपट पैसे कमाने हैं तो वही चोरी के अलावा और क्या उपाय हो सकता है! हाँ, दूसरी बात कालोभारी का काम करे तो... लेकिन यह भी चोरी के ही बराबर है...। उस पर पुलिस से बच पाओ तो। बाकी तो क्या उपाय हो सकता है?”
निमा दोर्जे के बुझे चेहरे पर उम्मीद का तनिक उजाला कौंध उठता है- “मिठे, मैं कालोभारी उठाऊँगा। तुझे मेरी मदद करनी होगी। तेरी तो बहुत से महाजनों से जान-पहचान है...। मैं जिसकी भी बोरी उठाने के लिए तैयार हूँ।”
मिठे को लगा कि उसने निमा दोर्जे को ठीक सुझाव दिया है। लेकिन इसमें बहुत खतरा है... जोखिम है। लेकिन अब इतना हो चुकने के बाद उसे पता था कि निमा दोर्जे पीछे हटने वाला नहीं है, उसकी मदद के बगैर मिठे के लिए दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा था।
रिनाक के एक व्यापारी से, जो याटुङ में खाद्य सामग्री की बड़ी मात्रा में तस्करी करता था, निमा दोर्जे के लिए बात कर दी रंगेली में एक इतवार के दिन।
उस हफ्ते के हाट के दिन दोनों रंगेली बाजार पहुँचते हैं। मिठे व्यापारी से मिलता है- व्यापारी को एक नए कुली की जरूरत थी। रंगेली से याटुङ तक एक मन चावल की बोरी पहुँचाने पर बीस रुपये का सौदा तय हुआ। निमा दोर्जे दो मन ढोने को तैयार था। वृहस्पति के दिन सामान लेने के लिए रंगेली आना तय हुआ।
निमा खुश था। उसे पता था याटुङ पहुँचने और वापस लौटने में तीन-चार दिन लगते थे। इस हिसाब से एक हफ्ते में वह कम से कम साठ रुपये आसानी से कमा सकता है। लगातार एक महीने में सामान ढो सका तो तीन सौ रुपये कमा लेगा। और एक साल में उसके सारे सपने साकार हो जाएँगे... अपने उस दो कमरों वाले घास-फूस की छत वाले घर पर टीन की छत लगाने और एक एकड़ खेत खरीद सकने में सक्षम हो जाएगा। इतना हो चुकने के बाद उस जैसे बाँके जवान से मसिनी की अम्मा-आपा शादी के लिए राजी हो जाएँगे और खुद मसिनी भी इनकार नहीं करेगी।
निमा दोर्जे ने अपनी बोरी उठाने की बात घर में किसी नहीं बताई... हो सकता है अम्मा रो-धोकर न जाने को मजबूर कर दे! वृहस्पतिवार सुबह मंडल बाबू का कोदो उठाने का बहाना बनाकर रंगेली बाजार पहुँचता है निमा दोर्जे।
रंगेली बाजार में उसे पता चला- उसके साथ जाने वाले और पाँच-छह लोग हैं- वह अकेला नहीं है। उस व्यापारी ने पुलिस से बचकर लिङताम, फदामचेन, नाथाङ, कुवुक तक अलग-अलग दुकानों के नाम जाली चालान काट रखे थे। कुवुक से पुलिस की नजरों से बचकर निकलने कुलियों के जिम्मे था।
अगली सुबह तड़के ही वह दल रवाना हो जाता है। निमा दोर्जे ने उसी शाम को नाथुला लाँघने की हिम्मत की लेकिन कुवुक पहुँचते-पहुँचते ही रात घिर आई।
यह निमा दोर्जे का पहला अनुभव था ‘कालो भारी’ ढोने का। वह पुलिस की निगरानी में नहीं था। उसकी किसी ने पूछताछ नहीं की। कोई शक-शुबह नहीं थी।
याटुङ पहुँचकर चावल का भाव सुनकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। रंगेली से लगभग दो गुना ज्यादा भाव था। उसने हिसाब लगाया- वह अगर दो सौ रुपयों तक की तस्करी करे तो हजार-डेढ़ हजार रुपये कमा सकता है। इस बार हिम्मत की है अब जो भी हो दो सौ रुपयों का जुगाड़ कर और सामान की तस्करी करनी है।
लिङताम से लौटकर अम्मा-आपा की बहुत डाँट खानी पड़ी। आस-पड़ोस में बात फैल गई कि घर में पुलिस आई। उसको लेकर पूछताछ की गई। उसे गोली से उड़ा देने की बात हुई। लेकिन उसे इन बातों का कोई वास्ता नहीं था- किसी के गाली-गलौच और धमकियों का। पाँच हजार रुपये कमाकर ही, जिसे कमाने के लिए उसके अनुमान के अनुसार केवल एक महीने का समय लगेगा, वह चैन की साँस लेगा।
वह पास्तिङ पहुँचता है और मिठे से मिलता है। अपनी सारी योजना सुनाकर पचास रुपये उधार माँगता है। मिठे चुपचाप रुपये दे देता है। तीस रुपयों में अपनी घड़ी बेच कर और इधर-उधर जान-पहचान वालों से उधार लेकर दो सौ रुपयों का इंतजाम कर लिया।
रंगेली जाकर उसने एक कनस्तर मिट्टी का तेल, एक कनस्तर खाद्य तेल, एक मन चावल और मैदा खरीदा। एक कुली का भी इंतजाम किया क्योंकि इतना सामान वह अकेले उठा नहीं सकता था।
अब उसे चिंता थी- इस सामान को कैसे सीमा पार किया जाए। पिछली दफा तो व्यापारी का सामान था- जिसकी व्यापारी ने कुवुक तक व्यवस्था कर दी थी, कोई डर नहीं था। लेकिन, इस बार हो सकता है, लिङताम में ही पुलिस की नजर में आ जाए। उसे पता था सिर्फ एक बार पकड़े जाने से उसकी सारी योजना चौपट हो जाएगी। पाँच-छह महीने हाजत में सड़ना पड़ेगा। उसने फैसला किया- वह लिङताम नहीं जाएगा। रंगेली से सिंगानेबास होकर बजिनी उतर कर एक रात वहीं ठहरेगा। वहीं से अगले दिन पेमलाखा और पाङलाखा पहाड़ी से होकर याटुङ का रास्ता पकड़ेगा। रास्ता बेहद घुमावदार और जोखिम भरा होने के बावजूद पुलिस से बचने का सबसे सरल रास्ता वही था।
जैसे सोचा था, अपना सामान उसने बिना किसी अवरोध के याटुङ पहुँचा दिया। अपने सामान के बदले में वह बीस घड़ियाँ और पचास ‘झ्याङ’ (डॉलर) लेकर लौटा।
लौटते वक्त लिङताम के रास्ते नहीं आया। रात को सीधा रंगेली पहुँचा और वहीं रात काटी। अगली सुबह तड़के ही वह आरिटार से होकर रिनाक पहुँचा और वहीं से कासिङ (पेदोङ) की ओर चल पड़ा। वहाँ से उसे अपने परिजनों से मुलाकात करने की इच्छा थी। लेकिन रास्ते में ही पता चला कि घर में कोई नहीं है। वह पेदोङ बाजार की ओर चल पड़ता है। अब वह ‘कंपनी’ (ब्रिटिश इंडिया) में प्रवेश कर चुका था- पुलिस का डर नहीं था। वह एक होटल में पहुँचा और तीन डबल मोमो खाए। इतना खा चुकने पर भी भूख न मिटने के बावजूद वह कालिम्पोङ की गाड़ी छुटने डर से चल पड़ा।
कालिम्पोङ पहुँचकर उसने एक दुकान में जाकर सभी घड़ियाँ बेच दीं- डॉलर के बदले भारतीय मुद्रा प्राप्त की। घड़ियों में उसे ठगा-सा महसूस हुआ। एक घड़ी के सिर्फ पचास रुपये मिले।
उसे याद था कि मिठे यह घड़ी नब्बे रुपये में खरीदी थी। डॉलर की भी कम कीमत मिली। उसने सुना था कि सात रुपये मिलते हैं एक डॉलर के लेकिन उसे तो केवल पाँच रुपये ही मिले।
अपेक्षित राशि न मिलने के बावजूद वह खुश था। इस दफा के समूचे सामान को ठिकाने लगा सका तो वह अपेक्षा से ज्यादा पैसा कमा सकता था। और वह अपनी मौजूदा जिंदगी में आमूल परिवर्तन ला सकने का उसने सपना देखा। उसकी आकांक्षएँ बढ़ चुकी थीं। अब वह लगभग वह सब भूलने लगा था जिसने उसे कालोभारी उठाने को बाध्य किया था।
कुछ दिनों के बाद वह कालिम्पोङ ठहरा।
इस बार उसने रंगेली से न खरीद कर रिनाक से सामग्री खरीदना और वहीं से रंगेली बाजार से न होकर बस्ती-बस्ती से होकर पहुँचाने का फैसला किया। उसे नौ-दस कुलियों की जरूरत पड़ी। लेकिन जैसा उसने सोचा था, वैसा नहीं हो पाया क्योंकि रिनाक में कुली पाना मुश्किल था। रंगेली आने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं बचा था।
ठेके पर सौंफ की दारू पीते हुए दो सिपाही उसकी ओर आते दिखाई दिए। उसका दिल बैठ गया। पकड़े जाने का डर सताने लगा। लेकिन भाग निकलने का रास्ता न देखकर खामोश बैठे रहने में भला समझा। जब में पैसे भी नहीं थे। सामान खरीदने के लिए दुकान में जमा कर दिये थे। उसे ऐसा करना अच्छा लगा।
पचास नंबर सिपाही (निमा दोर्जे उसका नाम नहीं जानता था) ने कहा- “ए दोर्जे, तू पी रहा है, हमें नहीं पिलाएगा?”
दोर्जे ने चैन की साँस ली और मजाकी लहजे में सिपाही की बात सुनकर तनिक मुस्कराया लेकिन बोला कुछ नहीं।
बाहर तेज धूप थी। रंगेली में मई-जून के महीने काफी गर्मी पड़ती है।
साठ नंबर सिपाही, जो अब तक वहाँ खामोश बैठा था, ने ताश खेलते हुए मामूली झगड़े में पाँच-छह महीने पहले सिंगताम में दोर्जे की अपनी पेटी खोलकर जबरदस्त धुलाई कर दी थी। लेकिन जब हद हो गई तो दोर्जे से इस सिपाही के जबड़ों पर मुक्का जड़ दिया था जिसके लिए उसे दो दिन तक हाजत में बंद कर दिया गया था। साठ नंबर सिपाही ने अभी उसकी ओर क्रूर नजरों से देखते कहा- “देख निमा, तेरे पर पूरी तरह से चौकसी बरती जा रही है। तूने फिर कालोभारी का धंधा किया तो तेरी खैर नहीं।”
गुस्सा तो बहुत आया- इस साठ नंबर के सिपाही को अभी काट दूँ और भाग जाऊँ कंपनी (इंडिया) की ओर। नहीं तो यहीं जिंदगी भर जेल में सड़ना पड़ेगा।... लेकिन उसने सोचा- ऐसा करने पर नुकसान तो खुद का ही होगा।
उसी दिन उसने खुकुरी भी खरीद ली। उसने सोचा, उसे किसी भी हालत में इस बार कालोभारी पहुँचानी ही है – चाहे जान चली जाए लेकिन याटुङ जाने के लिए उसे कोई रोक नहीं सकता! रास्ते में किसी ने रोका तो काट दूँगा।
निमा दोर्जे ने सुबह पौ फटते ही निकल जाने का इंतजाम किया। पाङलाखा टीला पार कर एक गोदाम में रात काटेगा। पूरे बारह लोगों का काफिला था। उसके अलावा याटुङ अभी तक कोई दूसरा नहीं पहुँचा था। पुलिस की नजर में की नहीं था। सभी ने अपना-अपना बंदोबस्त उसी तरह ही किया था। सभी को नाथुला के रास्ते और उसे खुद दूसरे रास्ते से लौटना था। मुमकिन हो तो डंकेला या छोल्होमो से संभव न हो तो पाङलाखा टीले से ही। डंकेला या छोल्होमो का सिर्फ नाम सुना था उसने- रास्ते से परिचित नहीं था। इसीलिए कोई उधर से आने वाला राहगीर मिल जाए तभी मुमकिन था। लेकिन पाङलाखा से ढलानी रास्ते से लौटना भी खतरों से खाली नहीं था। कुछ दिन पहले प्रेमलाखा में एक दल कालोभारी कुलियों को गिरफ्तार कर लिया गया था।
निमा दोर्जे ने अपने दल को गंभीरे से उतर कर लिङताम खड्ड पार कर सुभाने टीले से पाङलाखा लाने का विचार किया।
ठीक गंभीरे पहुँच कर खड्ड से निकलते वक्त लगा कि कोई आ रहा है। उसने सभी को रुक जाने को कहा। अपना बोरा उतारा और खुद चुपके से नजर रखने लगा। उजाला होने में काफी देर थी- आसमान पर तारे दिख रहे थे। उसने गौर से देखा। आने वाले लोगों को पहचान लेने पर उसके होशो-हवास उड़ने लगे। कर्मवीर सिपाही था। उसने सोचा- अब इसे पता चल जाएगा- इसीलिए इसे ठिकाने लगा देना होगा। उसने खुकुरी निकाली और चट्टान की ओट में छुप कर बैठ गया। फिर दूसरे मन से सोचा- हो सकता है इसे पता ही न चले- यदि वह लिङताम की ओर जा रहा होगा तो। लेकिन सिस्ने के रास्ते जाता है तो काम बिगड़ सकता है। नहीं, इसे ठिकाने लगाना ही होगा। उसके माथे पर पसीना उभर आया।
उसने देखा, कर्णवीर सिस्ने की ओर जा रहा है। अब निमा के पास दूसरा विकल्प नहीं बचा था। लेकिन अचानक उसे लगा- इसे मारने के क्या हासिल होगा! खुकुरी उलटी कर प्रहार करने ही वाला था- कर्णवीर ने मुड़कर देखा। निमा रुका नहीं। कर्णवीर लुढ़क गया।
उसके बाद दूसरी कोई घटना नहीं घटी। याटुङ से लौटते अपनी योजना के मुताबिक बाकी सभी कुलियों को याटुङ के रास्ते लौटाया।
इस बार उसकी योजना सफल हुई। उसने सोना चाहा था- मिला भी चालीस-पैंतालीस तोले सोना।
घर लौटते मौसम बिगड़ गया था। जोरों से पानी बरसने लगा। एक दिन लगातार बारिश में चलना पड़ा। ऐसे वीरान इलाके में रात काटना जान को जोखिम में डालने के बराबर था। पाङलाखा के घने जंगल में आकर रात काटने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था। तेज हवाओं से पेड़ों की सूखी टहनियाँ टूटने की आवाजें आ रही थीं। बिजली चमकने से पेड़ों की ओट में जाना खतरे से खाली नहीं था। बड़ी मुश्किल से निमा एक बड़ी चट्टान की ओट में जा पहुँचता है।
बारिश में सारा जिस्म भीग चुका था। बीती शाम से कुछ खाया-पीया भी नहीं था- फापर की रोटी खाने की फुर्सत भी नहीं मिली थी। कंदमूल तो मिलते हैं लेकिन ऐसी बारिश में कैसे ढूँढें!
चट्टान की ओत से भी पानी बह रहा था। चट्टान खिसकने की संभावना तो नहीं थी लेकिन ऐसे में भालूओं के आक्रमण की संभावना अवश्य थी। अचानक भालू आ जाने पर जान बचाने की चिंता सताने लगती है।
बारिश रुकने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे। कपड़े भीग कर जिस्म से चिपक गए थे। वह कमीज उतार कर पानी निचोड़ता है। हंटर बूट भी खोलता है- वे भी पानी से पूरी तरह भीग गए थे। ठंड, भूख-प्यास, थकान-अनिद्रा जिस्म पर भारी पड़ रहे थे। वह कमर में बाँधे सोने को टटोलता रहा। एक प्रकार की तसल्ली हुई। एक पल के लिए भूख-प्यास, भय सब काफूर हो गए।
लगातार मूसलाधार बारिश से उसके सामने वहीं रात बिताने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। सोने की जगह कहाँ थी? दो-तीन दिनों की भूख-प्यास, नींद और थकान थी। शायद इसी थकान की वजह से उसकी आँख लग गई। कब आँख खुली पता ही नहीं चला। लेकिन आँख खुलने तक उजाला नहीं हुआ था। बारिश अभी तक थमी नहीं थी। उसे जोरों से ठंड लगने लगी। तेज बुखार से आँखें खोलकर देखने में मुश्किल हो रही थी। और अब उसे चिंता सताने लगी। इस घने जंगल में इस मूसलादार बारिश में क्या करे! उसे लगा वह अपनी जिंदगी की आखिरी घड़ियाँ गिन रहा है।
सुबह होते ही बारिश कुछ कम हुई। बुखार भी कुछ कम हुआ। लेकिन शरीर में जोरों से दर्द हो रहा था। बारिश और अपनी खस्ता जिस्मानी हालत के बावजूद उसने चलने की सोची। वह आहिस्ता-आहिस्ता चढ़ाई के रास्ते हो लिया।
स्वस्थ होता तो पेमलाखा पहुँचने में करीब तीन घंटे का वक्त लगता लेकिन अपनी मौजूदा हालत के चलते उसे बहुत ज्यादा वक्त लगा। पेमलाखा के ऊपर पहाड़ी के किनारे आ पहुँचने तक शाम ढलने लगी थी। अचानक उसे लगा कि पेमलाखा से होकर जाना उचित नहीं है। इसीलिए वह फिर जंगल में रात का इंतजार करने लगा।
शाम ढल जाने के बाद वह सीधे सिंगानेबास की ओर चल पड़ा। धोजवीर मगर के घर वह रात के आठ बजे दरवाजे की कुंडी खटखटा रहा था। धोजवीर मगर सो चुका था, उठकर दरवाजा खोलता है।
“मनहूस! मैं तो सोच रहा था, इस वक्त रात को कौन होगा!...तू है। अंदर आ जा जल्दी। अरे, तू तो पूरी तरह से भीग चुका है।... बैठ, आग जला देता हूँ... चाय भी बना देता हूँ।”
निमा दोर्जे कुछ बोल सकने की हालत में नहीं था।
“हाँ भई... तेरे खतरनाक कारनामों के बारे में सुना है। तूने तो कर्णवीर पुलिस पर जानलेवा हमला किया है। तेरी तलाश में पुलिस तैनात कर दी गई है। तेरी तो अब खैर नहीं! लेकिन तू पेमलाखा से कैसे बच निकला?”
उसने धीरे से कहा- “मैं पेमलाखा से होकर नहीं आया। ऊपर जंगल से होता हुआ आया हूँ।”
“वही तो... मंडल के घर में तेरे आने के बारे में पुलिस विश्वस्त है, इसीलिए वहीं डेरा जमाकर बैठी हुई है।”
धोजवीर ने उसके लिए मक्की का भात और बिच्छू बूटी उबाल कर तैयार रखे थे। हिरण का सूखा माँस भूनकर दिया। बोझो (अदरक प्रजाति का एक कंद) खाने को दिया। दोनों काफी देर तक बातें करते रहे। निमा ने सबकुछ बता दिया।
अगली सुबह धोजवीर लिङताम पहुँचा। उसने सुराग लगाया कि आज शाम को सिंगानेबास और सुभाने टीले पर पुलिस गश्ती पर जा रही है। निमा दोर्जे नाथुला से भेजे सभी कुली पकड़े गए थे। वह दौड़ा-दौड़ा आया और निमा को वहाँ से निकल जाने की हिदायत दी। निमा तुरंत निकल पड़ा। वह इस इलाके के चप्पे-चप्पे से परिचित था। उसने जुगत लगाई- नीचे सुभाने टीले के मधुमक्खी के छत्ते लगाने वाली गुफा में जाकर छिपा जा सकता है। हालांकि यह खुद जान को जोखिम में डालने जैसा था- तनिक हाथ या पैर फिसलने से नीचे लिङताम खड्ड में।
वह दिनभर वहीं छिपा रहा। उसे मिठे से मिलना एकदम जरूरी लगा। अब इस संकट में केवल वही मदद कर सकता है लेकिन वह केवल रात को ही वहाँ से निकल सकता था।
दिन ढलते ही वह गुफा से निकला और टीले से होता हुआ पास्तिङ की ओर चल पड़ा।
मिठे ने उसे बताया- “देख निमा, तेरे लिए यहाँ रात को खतरा है। तुझे कर्णवीर सिपाही पर इस तरह हमला नहीं करना चाहिए था। पुलिस के हत्थे चढ़ गया तो तुझे जिंदा नहीं छोड़ेगी। तू अब कंपनी (इंडिया) भाग जा- हो सके तो आसाम की ओर चले जाना।”
निमा था कि उसे अपने गाँव को छोड़ने का रत्ती भर मन नहीं था। उसके लिए इतना मनमोहक गाँव दुनिया में कहीं नहीं था। लिङताम, सुभाने टीला, बाउचेन और अगमलोक। हर इतवार दोस्तों के साथ हाट पर जाना, और वहाँ फुटबॉल खेलना... गीत गाते लिङताम लौटना...!
मिठे ने भी शायद उसकी मौन भाषा समझ ली। कहा, “...तू यहाँ से जितनी जल्दी हो, निकल जा, बल्कि तत्काल निकल पड़। मेरा ननिहाल लाभा में है, मैं चिट्ठी लिख दूँगा- अपने खर्चे-पानी की तुझे कोई चिंता नहीं करनी पड़ेगी- तू वहीं जाकर रह। दूसरी बात- तू किसी भी सूरत में लिङताम मत जा... अपने घर पर भी नहीं!”
मिठे से विदा लेकर वह अगमलोक से निकलकर ऊपर टीले से होता हुआ सिस्ने पहुँचा और टेकवीर पाखरिन के घर रात काटी। वहाँ उसके बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता था। लेकिन उसने वहाँ ज्यादा देर रहना मुनासिब नहीं समझा। कोई उसे पहचान कर पुलिस को सूचित कर सकता था।
वहाँ से निकलकर देवराली होते हुए दक्षिण रिगु के रास्ते अंबा टीले की ओर निकल जाने का उसने फैसला किया।
देवराली के रास्ते जोते हुए कुछ खुसर-फुसर सुनाई देती है। भागने का मौका नहीं था। तितेपाती की झाड़ियों में छुप कर उसने देखा- दो सिपाही थे। दोनों ने उसे पहचान लिया। उसके होशो-हवास उड़ जाते हैं। अब क्या करे? तिस पर उसे तेज बुखार था, धूप तेज थी। सिपाही रतनवीर ने झाड़ियों के पास आकर कहा, “लगता है, यहाँ कोई छिपा हुआ है।”
“यह देवराली है, यहाँ देवी-देवताओं का वास होता है।” इतना कहते हुए ढेंडुप ने तितेपाती की एक ‘लिंगो’ तोड़ी उसी के सामने।
निमा दोर्जे को लगा, अब वे उसे देख लेंगे और गिरफ्तार कर लेंगे। उसने अपना हाथ खुकुरी की मूठ पर रखा। सोचा, या तो जान ली या जान गई।
लेकिन वे दोनों फिर वहाँ से खरामा-खरामा चढ़ाई के रास्ते चल देते हैं। निमा ने चैन की लंबी साँस ली। बुखार भी भूल गया। वह लगभग आधे घंटे तक इंतजार करता रहा कि कहीं कोई आ न जाए। और उसके बाद रास्ते पर निकलकर सीधा नदी की ओर चल पड़ता है। वहाँ से वह दक्षिण रिगु पहुँचता है। ऊपर सोरेङ गोन्पा से पावाखोला पार कर अम्बा टीले की ओर निकल जाता है। रास्ते में उसे दो-चार हिरण दिखाई देते हैं। लेकिन उस वक्त उसे उनका शिकार करने की कोई इच्छा नहीं थी- उन्हें केवल देखता रहा। बुखार तेज होता जा रहा था। बदन शिथिल होता जा रहा था। भरोसा नहीं था कि वह कहाँ तक चल सकेगा!
बुखार, तेज धूप, दिनभर चलने से जिस्म का पोर-पोर दुख रहा था– एक कदम आगे रखने की ताकत तक नहीं बची थी। एक चपटी चट्टान पर वह बेसुध पड़ गया। कब आँख लग गई, सुध भी नहीं थी। जब होश लौटी तो साँझ हो रही थी- दिन ढल रहा था। पर उस पार लुङचोक और छुजाचेन की पहाड़ियों पर अभी तक धूप थी। तभी उसे लगा– कोई उसके पीछे चुपके से आ रहा है। अचानक हाथ खुकुरी की मूठ पर पड़ जाता है- मुड़कर देखा तो पुंग्ली खड़ी थी अम्बा डाँडा की, लकड़ियों का गट्ठर उतार कर उसकी ओर आ रही थी।
निमा दोर्जे की डरावनी सूरत देखकर एक बार तो डर से उसकी चीख निकल गई। फिर संभलकर रुआँसी सूरत से बोली- “थेवा, मुझे मारोगे- काटोगे... काट दे मुझे। तेरे हाथों मरना मिले तो और क्या चाहिए!”
निमा खीझ कर बैठ गया। “ओहो... थेवा, तुम्हें तो जोरों का बुखार है। घर चल। यहाँ क्यों सो रहा है?”
फुंग्ली ने उस शाम उसकी खूब सेवा की। अच्छा-अच्छा खाना-पीना दिया। झाड़-फूँक भी करवा दी।
अगली सुबह फुंग्ली निमा थेबा की दवाई लेने रंगेली बाजार जाती है। लौट कर हाँफती हुई कहती है- “थेबा, तू भाग यहाँ से। पुलिस यहाँ आ रही है। मैंने नीचे चूनाभट्टी में देखा है, ऊपर के रास्ते आ रही है...। यह दवाई भी ले जाना और का लेना..तू जल्दी भाग... नहीं तो तुझे मार देंगे।”
और वह रोने लगती है।
निमा को वहाँ से भागना पड़ा। वह ऊपर मूल खर्क होकर लिंग्से उतरा और वहाँ से कागे होता हुआ पेदोंग और पेदोंग से सीधे लाभा पहुँच जाता है।
लाबा में उसका स्वास्थ्य और ज्यादा बिगड़ गया। वह निढाल हो कर गिर पड़ता है।
मिठे के परिजनों ने उसे गोरूबथान पहुँचाया। वहाँ से सिलिगुड़ी।
लाभा में छह महीने तक उपचार होता रहा। इस उपचार में उसका ज्यादातर सोना बिक चुका था।
अच्छी तरह स्वस्थ होकर वह फिर लाभा लौटता है और लगभग एक साल तक वहाँ रहता है।
डेढ़ साल के बाद वह लिङताम लौटता है। चीन और भारत का 1962 का युद्ध शुरू हो चुका था। उसने देखा रंगेली बाजार को चारों ओर फौज तैनात हो चुकी है। फदामचेन, लुङथुङ, नाथाङ और कुवुक में तो चप्पे चप्पे पर ।
इसके बाद कालोभारी उठाने की संभावना नहीं रही। समूचे सीमावर्ती क्षेत्र में कड़ी निगरानी के लिए और चीनी आक्रमण का सामना करने के लिए भारतीय सेना तैनात कर दी गई थी।
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टिप्पणीः इस कहानी को प्रकाशित करवाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। 1980 के दशक की शुरुआत में सिक्किम से बहुत कम साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं। जो एकाथ थीं वे नियमित भी नहीं थीं। इसीलिए उन पत्रिकाओं में स्थापित लेखकों या संपादकों के कृपापात्रों की रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। मैं इन वर्गों में शामिल नहीं था- इसीलिए मुझे अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने में कठिनाई होती थी। कालोभारी कहानी 1980 में लिखी थी और प्रकाशनार्थ लगभग सभी पत्रिकाओं में प्रेषित की थी लेकिन सभी से ‘अस्वीकृत’ की टिप्पणीसहित लौटा दी गई थी।
‘अर्चना’ के कहानी विशेषांक के प्रकाशित होने की सूचना सुनकर मैं इसके संपादक पूर्ण राई के कार्यालय में पहुँचा। कहानी देखकर उन्होंने मुझसे कहा- “विशेषांक तो प्रकाशित हो रहा है लेकिन आपकी यह कहानी प्रकाशित करना कठिन होगा। एक तो कहानी लंबी है- दूसरे आप स्थापित कथाकार नहीं हैं। सिक्किम में ही आप स्थापित कथाकारों की श्रेणी में नहीं आते, बाहिर की तो बात छोड़ दीजिए। आप जैसों की कहानी रखकर पत्रिका के स्तर को गिराना अच्छा नहीं होगा...”
कहानी अस्वीकृत हो चुकी थी, मैं निराश होकर लौट रहा था कि राधाकृष्ण शर्मा से मुलाकात हो जाती है। उन्हें मैंने सारा किस्सा सुना दिया। शर्माजी मुझे अपने कार्यालय ले गए। पूर्ण राई शर्मा के अधीन अधिकारी थे। शर्मा जी के अनुमोदन पर मेरी यह कहानी ‘अर्चना’ के ‘कहानी विशेषांक’ में प्रकाशित हुई।
कहानी प्रकाशित होने के बाद अनगिनत प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। सिक्किम में प्रायः लिखित प्रतिक्रिया नहीं आतीं- मौखिक बहुत आती हैं। उन अनेक मौखिक प्रतिक्रियाओं में कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं-
उस दौरान तुलसी ‘कश्यप’ सिक्किम विधानसभा के अध्यक्ष थे। देवराली बाजार में मुझे देखकर गाड़ी रोककर मुझे बुलाया और कहा- “आपकी कहानी ‘कालोभारी’ पढ़ी- शीर्षक गलत है। ‘कालोभारी’ का अर्थ अलग है। लेकिन कहानी बहुत अच्छी है।”
प्रसिद्ध कथाकार सानु लामा उस दौरान ग्राम विकास विभाग के अधीक्षक अभियंता थे। उन्होंने कहा- “कहानी सत्य घटना पर आधारित है लेकिन तुम्हें उस व्यक्ति की मौजूदा हालत के बारे में भी बताना चाहिए था।”
अग्रज लेखक रुद्र पौड्याल गान्तोक महाविद्यालय में प्राध्यापक थे। उन्होंने कहा, “उम्र में आप मुझसे कनिष्ठ हैं लेकिन लेखन में अब मुझसे वरिष्ठ हो गए हैं।”
मेरे एक मित्र आर. के. प्रधान ने कहा था– “तुम्हारी कहानी पढ़ी। कुछ लंबी हो गई है, कहानी छोटी होनी चाहिए। लंबी कहानी होने से तुम्हारी कहानी बोरिंग हो गई है।”
एक और सज्जन, मुझसे उम्र में छोटे थे, कहा था, “आपकी कहानी पढ़ी। बुरा मत मानना, मुझे यह कहानी अच्छी नहीं लगी- अविश्वसनीय! कहानी तो पूर्ण राई की कहानी जैसी होनी चाहिए।”
इस कहानी को लिखने के लिए मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। इसका मुख्य कारण कहानी में वर्णित सभी इलाकों में पहुँचकर प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने का प्रयास था। कहानी में वर्णित स्थान वास्तविक हैं- घटना का आधार भी- केवल संवाद, कथन, कुछ पात्र काल्पनिक हैं।
बाद में पता चला तुलसी ‘कश्यप’ का कथन सही था। ‘कालोभारी’ का वास्तविक अर्थ नाम्ची (दक्षिण सिक्किम) निवासी डी.पी. राजालिम ने अपनी पुस्तक ‘अतीत और वर्तमान’ (1993) में इस प्रकार बताया है- ‘सिक्किम में एक और विचित्र प्रथा थी कालोभारी। उस जमाने में भारत से तिब्बत सामान निर्यात किया जाता था। ये सामान सिक्किम से होकर जाता था- नाथुला, सेरेथाङ, छाङ्गु, चुङथाङ के रास्ते होकर। बर्फ से ढके रास्ते से पैदल पीठ पर लाद कर ले जाने वाले सामान को बर्फ से बचाने के लिए या सामान का पता किसी को न चले, इसलिए हर सामान के बोरे को सीकर बाहर से काला अलकतरा लीप दिया जाता था। बोरे में कौन-सा सामान बाँधा गया है, उसके बारे में पता न होने और काले अलकतरे से लीपे होने से इन बोरों को कालोभारी कहा जाने लगा था। ऐसे बोरे प्रजा को अनिवार्य रूप से गंतव्य पर बिना किसी पारिश्रमिक के पहुँचाने पड़ते थे। सिक्किम में शोषण की ‘कुरुवा-झारलंगी’ जैसी अन्य शोषण प्रथाओं की तरह इस प्रथा का पालन भी सिक्किम की रियाया को अनिवार्य रूप से बिना पारिश्रमिक के करना पड़ता था।
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